Thursday, 7 November 2019

वो मदभरी निगाहों में पूरा संसार लेके चलते हैं ।

जब वो चले तो अदाओं में बहार लेके चलते हैं
कभी गुलमोहर तो कभी गुलनार लेके चलते हैं। 
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जिधर देखें उधर वो ही नज़र आए हैं दफ़अतन
वो अपने जिस्म में क्या खुमार लेके चलते हैं। 

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होंठों पर लाली, आँखों में काजल, चेहरे पर हया
वो अपनी तासीर में कितने अंगार लेके चलते हैं। 

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उसे देख लें जी भर के तो भूख लगे, ना ही प्यास
वो साथ-साथ अपने शायद घर-बार लेके चलते हैं। 

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जो शख़्श मिला शहर में,उसका दीवाना निकला
वो मदभरी निगाहों में पूरा संसार लेके चलते हैं। 


सलिल सरोज

Sunday, 25 November 2018

मुझे भी शामिल करो, गुनहगारों की महफ़िल में ।

उसकी फितरत परिंदों सी थी,
मेरा मिज़ाज दरख़्तों जैसा
उसे उड़ जाना था और मुझे कायम ही रहना था.

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हमारे बगैर भी आबाद थी महफिले उनकी
और हम समझते थे कि उनकी रौनक हम से हैं ।

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निगाहें हर बात बयाँ कर देती है..
हसरतें भी, मोहब्बते भी..और..नफ़रतें भी..!!

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मानते हैं सारा जहाँ तेरे साथ होगा,
खुशी का हर लम्हा तेरे पास होगा,

जिस दिन टूट जाएँगी साँसे हमारी,
उस दिन तुझे हमारी कमी का एहसास होगा!

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मुझे भी शामिल करो, गुनहगारों की महफ़िल में ।
मैं भी क़ातिल हूँ,  मैंने भी अपनी ख्वाहिशों को मारा है ।।

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एक आदत सी हो गयी है चोट खाने की
भीगी हुए पलकों संग मुस्कुराने की,
काश अंजाम वफ़ा का पहले ही जानते..
तो कोशिश भी नहीं करते दिल लगाने की |

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कुछ गम, कुछ ठोकरें, कुछ चीखें उधार देती है
कभी-कभी जिंदगी, मौत आने के पहले ही मार देती है...

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हो मुबारक तुम्हें आज वो रौशनी की कतार,
हम तो यूँ अपने अंधेरों में, बहुत खुश हैं यार.!

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देख के दुनिया अब हम भी बदलेंगे मिजाज़
रिश्ता सब से होगा लेकिन वास्ता किसी से नहीं

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बार बार आईना पोंछा मगर, हर तसवीर धुंधली थी..!
न जाने आईने पर ओस थी या, हमारी आँखें गीली थीं...!!

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हस्तियां कुछ जल गईं, कुछ मिल गई खाकों में 
लोग तलाश रहे हैं,  जिन्दगी मौत की राखों में;

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माना कि जिंदगी सुनो दर्द से मुलाकात ही सही
सच्चाई के हर पल के कड़वे ये बयानात ही सही

जीना है हमको हर पल   इन सच्चाईयों के साथ
माना कि  कई सामने यूं  खड़े सवालात ही सही

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आँखों में तेरी कोई करिश्मा ज़रूर है…
तू जिसको देख ले; वो बहकता ज़रूर है…

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किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह;
वो आशना भी मिला हमसे अजनबी की तरह;
किसे ख़बर थी बढ़ेगी कुछ और तारीकी;
छुपेगा वो किसी बदली में चाँदनी की तरह।

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वादा करके निभाना भूल जाते हैं;
लगा कर आग फिर वो बुझाना भूल जाते हैं;
ऐसी आदत हो गयी है अब तो सनम की;
रुलाते तो हैं मगर मनाना भूल जाते हैं।

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नज़रों से ना देखो हमें..  तुम में हम छुप जायेंगे..
अपने दिल पर हाथ रखो तुम.. हम वही तुम्हें मिल जायेंगे..!

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मोहब्बत  के  लिए  खूबसूरत  होने  की  कैसी  शर्त !
इश्क हो जाए तो सब कुछ खूबसूरत लगने लगता है !!

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तेरे इश्क का कैदी बनने का अलग ही मज़ा है,
छूटने को दिल नहीं करता, और उलझने में मज़ा आता है

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नज़र से "नज़र" मिलाकर तुम "नज़र" लगा गए....
ये कैसी लगी "नज़र" की हम हर "नज़र" में आ गए...