Sunday, 2 September 2018

मेरे शब्द ।

फूलों की पंखुड़ी होते, अगर मेरे शब्द,

तुम गिन - गिन कर, मुझे याद करते ।

पेड़ों की पत्ति सरीखे, होते अगर,
हवाओं में तैरते, जा गिरते तुम्हारे आंगन में ।

होते मोती अगर, पिर जाते माला में,
शोभित करते तुम्हें, बन कर आभूषण ।

सुर अगर होते, बन जाते मधुर सरगम,
आनंदित करने को तुम्हें, बजते कानों में ।

अगर पंछी होते, जा बैठते डाल पर,
चहचहाते, उपवन में तुम्हारे।

किलकारी होते अगर, नन्हे शिशु की,
बन जाते, तुम्हारे होठों की मुस्कान ।

पत्र पर बिछ कर, तुम्हारी यादों को संजोते,
अमर कर देते, हमारा अध्भुत मिलन ।
कवि - राजीव अस्थाना 
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